अनिल त्रिगुणायत

इस वर्ष हर लिहाज से कोरोना महामारी हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी और अभी भी बनी हुई है. इससे भारत और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ा है. इस मामले में हमारी विदेश नीति की भूमिका बहुत हद तक कामयाब रही है. अपनी मुश्किलें होने के बावजूद भारत ने कई देशों को बड़ी संख्या में टीकों की खेप मुहैया करायी है. यह दुनिया के लिए एक मिसाल है. अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर भी संतोषजनक प्रगति है और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष समेत विभिन्न एजेंसियों ने वर्तमान वित्त वर्ष में वृद्धि दर के आठ से नौ फीसदी रहने की उम्मीद जतायी है.

तीसरी उपलब्धि यह है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में इस साल रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है. इसमें भी विदेश नीति की बड़ी भूमिका होती है. भारत ने इस साल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रहा, जहां अफगानिस्तान बहुत बड़े मुद्दे के तौर पर सामने आया. उल्लेखनीय है कि अगस्त में जब तालिबान अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज हुआ, तब भारत सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष था.

अफगानिस्तान का घटनाक्रम भारतीय हितों के अनुरूप नहीं था, फिर भी भारतीय कूटनीति ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर स्थिति को संभालने में बड़ा योगदान किया है. गंभीर मानवीय संकट से जूझ रही अफगान जनता को राहत पहुंचाने में भी भारत की भूमिका रही है. इजरायल और हमास के बीच तनाव के मुद्दे पर भारत ने स्पष्टता के साथ अपनी बात रखी और समाधान निकालने में सहयोग दिया. भारत का जोर संवाद से तनाव दूर करने पर रहा है.

यदि हम अपने पड़ोस के हवाले से देखें, तो दक्षिण एशियाई देशों के साथ हमारे संबंध बेहतर हुए हैं. महामारी के दौर में भारत से जो भी संभव हो सका, पड़ोसी देशों को मदद भेजी गयी. इस दौरान सार्क की प्रासंगिकता भी रेखांकित हुई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहल करते हुए कोरोना पर सार्क देशों का शिखर सम्मेलन आयोजित किया. उन्हीं की कोशिशों से सार्क कोविड फंड की स्थापना हुई है. उन्होंने दक्षिण एशियाई देशों में स्वास्थ्यकर्मियों के निर्बाध आवागमन पर भी बल दिया है.

पाकिस्तान से होनेवाली घुसपैठ और आतंकी गतिविधियों में भी कमी आयी है. साल 2021 इस लिहाज से भी अहम रहा है कि मध्य एशिया के साथ भारत के संबंधों का नया दौर शुरू हुआ है. कुछ समय पूर्व पांच मध्य एशियाई देशों के विदेश मंत्री भारत आये थे. उस दौरान अफगानिस्तान के अलावा ऊर्जा समेत विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग और संपर्क बढ़ाने पर सहमति बनी है.

इससे पहले भारत की पहल पर कई देशों के सुरक्षा सलाहकारों की बैठक हुई थी, जिसमें मध्य एशियाई प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया था. इन देशों के राष्ट्राध्यक्षों को भारत ने गणतंत्र दिवस समारोह में बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया है. संपर्कों के हवाले से दक्षिण एशिया, मध्य एशिया, ईरान और पश्चिमी एशिया के साथ संबंधों का विस्तार उल्लेखनीय उपलब्धि है.

चीन के साथ हमारे संबंध तनावपूर्ण हैं. कई दौर की बातचीत के बाद भी सीमा पर तनातनी बरकरार है. आगामी समय में भी चीन हमारे लिए चुनौती बना रहेगा. लेकिन कुछ समय पहले तक ब्रिक्स समूह की अध्यक्षता भारत के पास थी. इसमें चीन भी है. उस दौरान इस बहुपक्षीय मंच की उपयोगिता बढ़ाने में भारत के प्रयासों के परिणाम उत्साहजनक रहे हैं. शंघाई सहयोग संगठन तथा रूस-चीन-भारत समूह (आरआइसी) में भी चीन और भारत दोनों शामिल हैं. इन मंचों के माध्यम से दोनों देशों के बीच कूटनीति संपर्क है. पिछले दिनों रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आये थे.

उस दौरान भी प्रमुख मुद्दों पर राष्ट्रपति पुतिन और प्रधानमंत्री मोदी के बीच चर्चा हुई, जिनमें चीन का मसला भी है. ऐसे संकेत हैं कि जल्द ही भारत, चीन और रूस के नेताओं का शिखर सम्मेलन हो सकता है. इस साल अमेरिका के साथ हमारे संबंध और प्रगाढ़ हुए हैं. पर साथ ही, रूस के साथ रिश्तों में भी मजबूती आयी है. इस समीकरण में भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता का प्रदर्शन बहुत प्रभावी ढंग से किया है. जब 2023 में भारत जी-20 की अध्यक्षता करेगा, तब यह स्वायत्तता और महत्वपूर्ण साबित होगी.

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पदभार संभालते ही क्वाड देशों- भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया- के नेताओं की शिखर बैठक आयोजित की. इस साल दो ऐसी बैठकें हो चुकी हैं. क्वाड का सामरिक पहलू कुछ कम अहम हुआ है या यूं कहें कि भारत का ध्यान इस बिंदु पर कम है, पर भारत के आर्थिक हितों और वैश्विक आपूर्ति शृंखला की नियमितता के लिहाज से क्वाड बड़ी अच्छी पहल है. हम वैक्सीन निर्माण के केंद्र बन चुके हैं. भारत से दवाइयों की आपूर्ति में इससे बड़ी मदद मिलेगी.

इसके अलावा तकनीक हस्तांतरण की संभावनाएं पैदा हुई हैं. आतंकवाद की रोकथाम भी एक बड़ा मुद्दा है. इन मामलों में क्वाड प्रभावी मंच बन सकता है. पश्चिम एशिया में भी अमेरिका, भारत, इजरायल और संयुक्त अरब अमीरात का एक समूह आकार ले रहा है. अगस्त में प्रधानमंत्री मोदी ने सामुद्रिक सुरक्षा पर सुरक्षा परिषद की बैठक की अध्यक्षता की थी. उसमें राष्ट्रपति पुतिन समेत अनेक बड़े नेता शामिल हुए थे. इन पहलों से इंगित होता है कि भारत ने वैश्विक महत्व के मुद्दों को विमर्श के केंद्र में लाया है तथा रचनात्मक सुझाव अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिया है.

जलवायु परिवर्तन दुनिया के सामने आज सबसे बड़ी समस्या है. ग्लासगो जलवायु सम्मेलन में भारत ने विकासशील देशों की चिंताओं को सामने प्रभावी ढंग से रखा. इस संबंध में यह अहम है कि पहले प्रस्तावक देश को अपनी उपलब्धियों को भी दुनिया के समक्ष रखना होता है. भारत ने देश के भीतर स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की दिशा में कई कदम उठाया है. प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर फ्रांस के साथ बने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन में अमेरिका समेत कई देश शामिल हो चुके हैं.

भारत ने कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी का लक्ष्य रखकर वैश्विक समुदाय के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है. जलवायु के मामले में भारत ने केवल अपने हितों को ध्यान में नहीं रखा है, बल्कि सभी विकासशील देशों की बात की है, चाहे वह विकासित देशों से निवेश का मामला हो या फिर स्वच्छ ऊर्जा की ओर जाने के लिए तकनीक हस्तांतरण का प्रश्न हो. कुल मिलाकर, कूटनीति के मोर्चे पर भारत का स्कोर कार्ड बहुत अच्छा रहा है. हमें चीन को लेकर सतर्क रहना होगा, पर पाकिस्तान को बहुत अधिक महत्व देने की आवश्यकता नहीं है. 

लेख पहली बार प्रभात खबर कूटनीति के लिए अहम रहा 2021 में 30 दिसंबर 2021 को छपा|

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लेखक के बारे में

अनिल त्रिगुणायतजॉर्डन, लीबिया और माल्टा में भारत के पूर्व राजदूत।