निजीकरण के खिलाफ और श्रम सुधारों को लेकर श्रमिक संगठनों की देशव्यापी हड़ताल का असर दिखा है। हाल के वर्षों में हम वक्त-वक्त पर ऐसी हड़तालें या बंद देखते रहे हैं। जाहिर है, श्रमिक संगठन ऐसा करके अपने हित के मुद्दे उठाते हैं, जो श्रम कानूनों, महंगाई, वेतन आदि से जुड़े होते हैं। इन मसलों के अनवरत बने रहने की एक बड़ी वजह हमारी नीतियों का ‘डिमांड साइड इकोनॉमिक्स’ के बजाय ‘सप्लाई साइड इकोनॉमिक्स’ पर आधारित होना है। ‘सप्लाई साइड इकोनॉमिक्स’ का मतलब है, कारोबारी हित में नीतियों का बनना, ताकि उत्पादों की आपूर्ति बढ़े। माना जाता है कि इससे कारोबारी ज्यादा निवेश के लिए उत्सुक होते हैं, जिससे उत्पादन में वृद्धि होती है और अर्थव्यवस्था आगे बढ़ती है। मगर देखा यह गया है कि जब मांग कम हो, तब यह नीति काम नहीं करती। साल 2019 में ही जब केंद्र सरकार ने ‘सप्लाई साइड इकोनॉमिक्स’ के तहत कॉरपोरेट टैक्स कम किया, तब बाजार में मांग कम होने के कारण निवेश में इजाफा नहीं हुआ। निजी क्षेत्र ने इस सरकारी छूट का लाभ अपनी ‘बैलेंस शीट’ को ठीक करने में किया। नतीजतन, हमारी आर्थिक विकास दर गिरती चली गई।