अरुण कुमार

अर्थशास्त्र का यह सामान्य नियम है कि जब बाजार में मांग होती है, तब महंगाई बढ़ती है। पर मांग न होने के बावजूद यदि कीमतें आसमान छू रही हों, तो उसकी एक बड़ी वजह तंत्र की गड़बड़ी मानी जाती है। और, यदि मंशा कीमतें बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को संभालना हो, तो चढ़ती महंगाई मांग कम कर देती है, जिससे अर्थव्यवस्था का नुकसान ही होता है। भारत में फिलहाल ऐसी ही स्थिति है। कोरोना से ध्वस्त हो चुके भारतीय बाजार में मांग काफी कम हो गई है, फिर भी यह बेहिसाब महंगाई से जूझ रहा है। खाने के तेल से लेकर दाल, सब्जियां, रसोई गैस, पेट्रोल-डीजल, दूध जैसी तमाम रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ गए हैं। इसकी सबसे ज्यादा मार असगंठित क्षेत्र से जुड़े लोगों पर पड़ी है, जिनकी हिस्सेदारी भारतीय श्रम-बल में लगभग 94 फीसदी है। 

आंकडे़ बताते हैं कि मई में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 6.3 फीसदी हो गई, जबकि अप्रैल में यह 4.23 फीसदी थी। थोक महंगाई दर भी अपनी रिकॉर्ड ऊंचाई (12.94 फीसदी) पर है। चूंकि थोक मूल्य का असर उपभोक्ता मूल्य पर पड़ता है और पिछले मार्च से ही थोक मूल्य में तेजी दिख रही है, इसका मतलब है कि आने वाले महीनों में भी उपभोक्ताओं को शायद ही राहत मिल सके। हालांकि, महंगाई दर गिरने का अर्थ यह नहीं होता कि वस्तुओं के दाम कम हो रहे हैं। इसका मतलब होता है, कीमत बढ़ने की उसकी रफ्तार कम हो रही है।

बहरहाल, सवाल यह है कि जब बाजार में मांग बहुत कम है, तब दाम क्यों चढ़ रहे हैं? इसकी कई वजहें हैं। सबसे बड़ा कारण तो आपूर्ति शृंखला का कमजोर होना है। कहा जा रहा है कि फसल वर्ष 2020-21 में देश में खाद्यान्न का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है और 2.66 फीसदी की वृद्धि के साथ यह रिकॉर्ड 30.5 करोड़ टन की ऊंचाई पर पहुंच गया है। इस रिकॉर्ड पैदावार के बावजूद यदि खाद्यान्न के मूल्य चढ़ रहे हैं, तो साफ है कि बाजार में उनकी पर्याप्त आपूर्ति नहीं हो रही। यही हाल फल और सब्जियों का है, जिनके बारे में कयास हैं कि जमाखोरों द्वारा भंडारण किए जाने से यह स्थिति पैदा हुई है।

पेट्रो उत्पादों का गणित अलग है। चूंकि चीन, अमेरिका जैसी अर्थव्यवस्थाएं सुधार की राह पर हैं, इसलिए कच्चे तेल, धातु आदि की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ रही हैं, जिसका नुकसान हम जैसी अर्थव्यवस्थाओं को हो रहा है, जो अब तक कोरोना से उबर नहीं सकी हैं। दिक्कत यह भी है कि हमने इन पर कई तरह के टैक्स लगा रखे हैं, जबकि यह जगजाहिर तथ्य है कि पेट्रो उत्पादों की कीमतों और महंगाई में सीधा रिश्ता होता है। पेट्रोल-डीजल के मूल्य बढ़ते ही सभी उपभोक्ता वस्तुओं के दाम चढ़ जाते हैं।

सामान्य उपभोक्ताओं द्वारा इस्तेमाल के लिए खरीदे जाने वाले उत्पादों, यानी फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (एफएमसीजी) के निर्माता भी महंगाई बढ़ने की एक वजह बता रहे हैं। उनका कहना है कि उनकी लागत बढ़ने की वजह से एफएमसीजी के दाम बढ़ गए हैं। मगर उनका यह तर्क गले नहीं उतरता, क्योंकि तमाम मुश्किलों के बाद भी न सिर्फ अनिवार्य वस्तुओं की खरीदारी बनी हुई है, बल्कि कोरोना काल में बेरोजगारी में इजाफा होने से एफएमसीजी कंपनियों को कम कीमत पर श्रमिक भी उपलब्ध हो रहे हैं। जाहिर है, कारोबारी समाज का रुदन दिखावटी है। वे अब भी फायदा कूट रहे हैं, जिस पर सरकार को लगाम लगानी चाहिए। अर्थशास्त्र भी यही कहता है कि मांग कम होने के बावजूद यदि दाम बढ़ते हैं, तो उसका ज्यादातर लाभ कारोबारी उठाते हैं।

महंगाई बढ़ने की एक वजह लोगों का स्वास्थ्य खर्च बढ़ना भी है, क्योंकि महामारी की वजह से इलाज और दवाओं पर लोगों के खर्च बढ़ गए हैं। विडंबना यह है कि महंगाई सूचकांक में इस क्षेत्र की नाममात्र की गिनती होती है। यानी, महंगाई दर में जो वृद्धि दिख रही है, असलियत में उससे कहीं ज्यादा की मार आम लोगों पर पड़ी है।

सवाल है, बढ़ती महंगाई पर लगाम कैसे लगाई जाए? सबसे पहला काम आपूर्ति शृंखला को दुरुस्त करने का होना चाहिए। बाजार तक खाद्यान्न की पर्याप्त आमद सुनिश्चित की जानी चाहिए। पेट्रो उत्पादों पर बढ़ाए गए टैक्स को भी कम करने की दरकार है। सरकारें कह सकती हैं कि टैक्स कम करने से उनकी आमदनी कम हो जाएगी। मगर इच्छाशक्ति हो, तो इस मसले का हल निकल सकता है। अप्रत्यक्ष के बजाय वे प्रत्यक्ष कर बढ़ा सकती हैं। यदि अर्थव्यवस्था को संभालना प्राथमिकता है, तो उन्हें  न सिर्फ मांग बढ़ाने के उपाय करने होंगे, बल्कि लोगों की जेब में पैसे भी डालने होंगे। संभव हो, तो शेयर बाजार में लेन-देन पर टैक्स वसूला जा सकता है।

इससे सरकारी खजाने में वृद्धि तो होगी ही, महंगाई भी नहीं बढ़ेगी। मिसाल के तौर पर, यदि मान लें कि शेयर बाजार में हर दिन 10,000 करोड़ रुपये के लेन-देन होते हैं, तो इस पर सिर्फ 0.1 फीसदी कर लगाने से सरकारी खजाने में रोजाना 10 करोड़ रुपये जमा होंगे। ऐसे किसी टैक्स से शेयर बाजार की अस्थिरता भी कम होगी। ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि अर्थशास्त्र एक ही साथ अर्थव्यवस्था में तेज गिरावट और शेयर बाजार में तेज उछाल को उचित नहीं मानता। विश्व समाज ऐसी अर्थव्यवस्था पर भरोसा नहीं करता। इनके अलावा, जिन-जिन क्षेत्रों में तरलता है, वहां कोविड बॉन्ड जारी करके भी सरकार पैसे जुटा सकती है। 

कुछ अर्थशास्त्री यह तर्क दे सकते हैं कि महंगाई बढ़ने से अर्थव्यवस्था को फायदा होगा। मगर यह उस स्थिति में बेहतर मानी जाएगी, जब हालात सामान्य हों और महंगाई दर दो-तीन फीसदी से अधिक न बढ़े। मगर अभी कोरोना संक्रमण-काल में हालात आम दिन जैसे नहीं हैं। देश में असमानता बढ़ने की एक वजह यह महंगाई भी है, क्योंकि कारोबारी समाज ऐसे माहौल का फायदा उठाता है, जबकि आम लोगों पर इसका जबर्दस्त प्रहार होता है। महामारी के पहले आठ तिमाही में विकास दर आठ फीसदी से घटकर 3.1 फीसदी हो गई, तो इसकी वजहें बढ़ती असमानता और कम होती मांग भी थीं। सरकार को मांग बढ़ाने की व्यवस्था करनी ही चाहिए। तभी महंगाई भी थम सकेगी। 

लेख पहली बार लाइव हिन्दुस्तान में छपा: मांग कम, फिर महंगाई क्यों? 03 जुलाई 2021 को|

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लेखक के बारे में

Arun

प्रोफेसर अरुण कुमार, अर्थशास्त्री और मैल्कम एस अदिशेशिया अध्यक्ष प्रोफेसर, सामाजिक विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली|

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